September 28, 2021

कथाएं

-देवेश कुमार 'गौड़'  होली का दिन था। सुबह से ही पूरे गाँव में बच्चों का हुड़दंग शुरू हो गया था। वे बाल्टी और पिचकारी ले-लेकर एक-दूसरे के पीछे दौड रहे थे। घर के आँगन की दीवार पर मुँह लटकाए बैठा छज्जू मन-ही-मन कुढे जा रहा था।  'क्या नसीब है? होली का दिन और यूँ सूखा-सूखा। एक खुराक मिल जाती, तो...

1 भगतू लुहार, घर के छज्जे पर बैठा हुक्का गुड़गुड़ा रहा था। दोपहर होने को आई थी, मगर बिशन का...

राजस्थान की डूंगरपुर रियासत के एक कस्बे की कहानी है। कस्बे का नाम लक्ष्मणगढ़ है।लक्ष्मणगढ़ में कुछ राजपूत, कुछ वैश्य,...

किसी समय वाराणसी में एक राजकुमार इतना दुष्ट था कि उसकी दुष्टता देखकर उसका नाम ही दुष्टकुमार पड़ गया। उसकी...

बोध कथा सेठ अनाथपिंडक गौतम बुद्ध के परम स्नेह-भाजन थे। वे अपने मन की तमाम बातें और वेदना नि:संकोच उनके...

जया कुछ परेशान थी। स्कूल ट्यूशन, कोचिंग सब बंद हैं। उसने अपने मार्गदर्शक दिलीप अंकल से समस्या का समाधान फोन पर...