September 28, 2021

NCT बिल : केंद्र सरकार की बौखलाहट

दिल्ली में लेफ्टिनेंट गवर्नर और मुख्यमंत्री के अधिकारों को स्पष्ट करने वाला विधेयक ‘गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली (अमेंडमेंट) बिल 2021’ संसद के दोनों सदनों से पास हो गया है। अब राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही यह बिल कानून बन जाएगा। दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार तथा कई अन्य संगठनों तथा राजनीतिक दलों ने इसे ‘लोकतंत्र का काला दिन’ करार दिया है।

पहली बार जब दिल्ली के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी 70 में से 67 सीटें जीत कर सत्तारूढ़ हुई थी और भारतीय जनता पार्टी को मात्र तीन ही सीटों पर संतोष करना पड़ा था, प्राय: तभी से वह येन-केन प्रकारेण एलजी के माध्यम से उसके कामकाज में बाधक बनती रही है। शुरुआती दौर में दिल्ली की चुनी हुई आप सरकार की योजनाओं और कार्यों से संबंधित सैकड़ों फाइलें एलजी और केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा दाब कर रख ली गईं, उन पर कोई काररवाई न कर आप सरकार की निष्क्रियता का संदेश दिया गया। बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा।

2018 और 2019 सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों के जरिए एलजी और दिल्ली सरकार की भूमिकाओं और अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट किया। अब केंद्र सरकार की दलील है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश में जो भावना है, उसे लागू करने के लिए ही वह गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली ऐक्ट में संशोधन लाई है। संसद के दोनों सदनों से पास हो चुके इस बिल के तहत एलजी का अधिकार क्षेत्र काफी विस्तृत हो गया है। बिल में प्रावधान है कि राज्य कैबिनेट या सरकार किसी भी फैसले को लागू करने से पहले लेफ्टिनेंट गवर्नर की ‘राय’ लेगी।

इस प्रकरण में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि केंद्र सरकार को दो-तीन साल बाद अचानक सुप्रीम कोर्ट की ‘भावना’ ‘लागू’ करने के लिए ‘गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली ऐक्ट में संशोधन’ की याद कैसे आ गई? क्या 2018-19 से दिल्ली में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था?

सच तो यह है कि 2018-19 के बाद से आप सरकार की जनहितकारी योजनाओं और सरकार की बढ़ती लोकप्रियता से केंद्र सरकार बौखला गई है, जबकि उसके स्वयं के सभी कदम जनहित और लोकतंत्रात्मकता से कोसों दूर रहे हैं। हाल ही में दिल्ली में संपन्न हुए एमसीडी के उपचुनावों में भाजपा की करारी हार इसी ओर इंगित करती है।

दूसरी ओर, आप सरकार डीटीसी की बसों में महिलाओं की मुफ्त यात्रा, 2000 लीटर तक मुफ्त पानी, 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली, मुफ्त चिकित्सा सुविधा, सरकारी स्कूलों की शिक्षा-व्यवस्था में आशातीत सुधार आदि प्राय: सभी कार्य जनहितकारी हैं, जनता भी संतुष्ट है।

नए बिल के अनुसार, दिल्ली विधानसभा के बनाए किसी भी कानून में सरकार से मतलब एलजी से होगा। एलजी को सभी निर्णयों, प्रस्तावों और एजेंडा की जानकारी देनी होगी। यदि एलजी और मंत्रिपरिषद के बीच किसी मामले पर मतभेद है तो एलजी उस मामले को राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं। इतना ही नहीं, एलजी विधानसभा से पारित किसी ऐसे बिल को मंजूरी नहीं देंगे जो विधायिका के शक्ति-क्षेत्र से बाहर हैं। वह इसे राष्‍ट्रपति के विचार करने के लिए रिजर्व रख सकते हैं।
इस बिल के तहत दिल्ली में चुनी हुई सरकार के अधिकार सीमित किए गए हैं। बिल के मुताबिक, दिल्ली विधानसभा खुद या उसकी कोई कमिटी ऐसा नियम नहीं बनाएगी जो उसे दैनिक प्रशासन की गतिविधियों पर विचार करने या किसी प्रशासनिक फैसले की जांच करने का अधिकार देता हो। यह उन अधिकारियों की ढाल बनेगा जिन्हें अक्‍सर विधानसभा या उसकी समितियों की तरफ से तलब किए जाने का डर होता है।

इस प्रकार दिल्ली की जनता द्वारा चुनी हुई सरकार के अधिकारों को छीन कर एलजी के हाथ में सौंप दिया गया है। विडंबना देखिए कि लोकतंत्र की हत्या के लिए संसद को चुना गया जो लोकतंत्र का मंदिर है।

वैसे सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के अपने फैसले में भी साफ किया था कि दिल्ली सरकार जो भी फैसला लेगी, उसके बारे में वह एलजी को जानकारी देगी। लेकिन एलजी की सहमति जरूरी नहीं है। हालांकि, अब इस बिल के तहत एलजी को यह अधिकार मिल गया है कि अगर वह मंत्रिपरिषद के किसी फैसले से सहमत नहीं हैं तो मामले को राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं।
समग्रत: बिल के कानून बन जाने के बाद दिल्ली के एलजी के अधिकार काफी बढ़ जाएंगे। हालांकि, केंद्र सरकार का कहना है कि इस बिल को सिर्फ एलजी और दिल्ली सरकार की भूमिकाओं और शक्तियों को स्पष्ट करने के लिए लाया गया है ताकि गतिरोध न हो। अब एनसीटी बिल को संसद की मंजूरी मिलने के साथ साथ ही, राष्ट्रीय राजधानी में एक बार फिर एलजी बनाम मुख्यमंत्री की नई जंग और कानूनी लड़ाइयों का सिलसिला देखने को मिल सकता है।