September 28, 2021

राजनीति में बढ़ता परिवारवाद

कैसी विडंबना है कि किसी समय परिवारवाद की कट्टर विरोधिनी रहीं बसपा प्रमुख मायावती भी अब परिवारवाद के दलदल में कूद पड़ीं हैं।  कुछ दिन पूर्व उन्होंने भी विधिवत घोषणा कर दी कि उनका भाई आनंद और भतीजा आकाश पार्टी में क्रमश: नंबर दो और तीन के पद पर रहेंगे।   

वैसे देखा जाए तो यह कोई नई बात नहीं है, क्योंकि राजनीति के प्रांगण में परिवारवाद का बोलबाला प्राय: रामायण-महाभारत काल से ही रहा है। आज भी राजनीति में प्राय: सर्वत्र परिवारवाद का वर्चस्व परिलक्षित होता है। जिस तरह परिवार का मुखिया स्व-अर्जित एवं पैतृक संपदा अपने बाल-बच्चों को ही सौंपना चाहता है, उसी प्रकार राजनीतिक दलों के मुखियाचाहते हैं कि उनकी राजनीतिक संपदा उनके बच्चे या निकटतम बंधु-बांधव ही संभालें।

वस्तुत: राजनीतिक दलों में भिन्नता विचारों के आधार पर होती है। किसी समय कांग्रेस आजादी के लिए संघर्ष करने वाली एक राष्ट्रीय संस्था थी। उसके मंच पर सब विचारों के लोग आते थे। इसीलिए आजादी मिलने पर गांधीजी ने कांग्रेस भंग करने के लिए कहा था, ताकि लोग अपने विचारों के अनुसार राजनीतिक दल गठित कर चुनाव लड़ें; पर जवाहर लाल नेहरू उनकी यह विरासत छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए। 

1947 तक कांग्रेस और उसमें शामिल समूहों का लक्ष्य आजादी था। अतः देश की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और शैक्षिक स्थिति; खेती और उद्योग आदि के बारे में उनके विचार न तो स्पष्ट थे और न ही किसी को पता थे; पर आजादी के बाद इन विषयों पर अपने विचार स्पष्ट करना आवश्यक हो गया। इस संदर्भ में जवाहरलाल नेहरू पर कुछ वामपंथी विचारधारा का प्रभाव परिलक्षित होता है, जिसके बल पर वह आजीवन देश पर राज करते रहे।

आगे चलकर कांग्रेस से डॉ. राम मनोहर लोहिया, आचार्य कृपलानी, आचार्य नरेंद्र देव आदि कई नेता अलग हुए, जिन्होंने मुख्यतः समाजवाद के नाम पर नए दलों का गठन किया। कुछ राज्यों में ये दल प्रभावी भी हुए; पर इनकी देशव्यापी पहचान नहीं बन सकी। दूसरी ओर राष्ट्रवाद तथा हिंदुत्व के पक्षधर ‘भारतीय जनसंघ’ के विस्तार का आधार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ था। संघ के विस्तार के साथ ही जनसंघ भी बढ़ता रहा। 

पर धीरे-धीरे राजनीति में विचारों का महत्व घटने लगा। सोवियत रूस के विघटन से साम्यवाद अप्रासंगिक हो गया। अमेरिका का प्रभुत्व बढ़ने से सबका ध्यान पूंजीवाद की ओर बढ़ा। चीन ने भी साम्यवाद के खोल में पूंजीवाद अपना लिया। भारत में यद्यपि गरीबों के वोट लेने के लिए कोई दल पूंजीवाद का खुला समर्थन नहीं करता; पर सच ये है अधिकांश दल इसी राह पर चल रहे हैं। विचारों का आधार समाप्त होने पर राजनीतिक दलों ने अपने अस्तित्व के लिए परिवार को आधार बना लिया। 

कांग्रेस में नेहरू परिवार का प्रभुत्व था। अतः जो नेता कांग्रेस से विचारों की भिन्नता का बहाना बनाकर अलग हुए, उनके दल परिवार आश्रित हो गए। परिवारवाद के नाम पर नेहरू का विरोध लोहिया ने, इंदिरा गांधी का चरणसिंह ने, चरणसिंह का मुलायम और देवीलाल ने किया; पर आज इन सबके दल निजी दुकान बन कर रहे गए हैं। शरद पवार, उद्धव और राज ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल, ओमप्रकाश चौटाला, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, लालू और मुलायम सिंह यादव, महबूबा मुफ्ती, फारुख अब्दुल्ला, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, चंद्रशेखर राव, चंद्रबाबू नायडू आदि केवल नाम नहीं, एक राजनीतिक दल भी हैं। 

इस राजनीतिक परिवारवाद का एक दुष्परिणाम यह दिखाई देता है कि परिवरों समान इनमें भी लड़ाई-झगड़े बढ़ने लगे हैं। परिवार में भाइयों और फिर उनके बच्चों में सम्पत्ति के नाम पर झगड़े होते हैं, ऐसा ही इन घरेलू दलों में भी होता है। उ.प्र. में मुलायम सिंह की राजनीतिक विरासत पर कब्जे के लिए उनके भाई शिवपाल और बेटे अखिलेश में झगड़ा रहा है। महाराष्ट्र में बाल ठाकरे की विरासत के लिए उद्धव और राज ठाकरे में टकराव है। आंध्र में एन.टी. रामराव की विरासत उनके बेटे की बजाय दामाद चंद्रबाबू नायडू ने कब्जा ली। चौटाला परिवार में सिर फुटव्वल का कारण भी यही है। बिहार में लालू के दोनों बेटे और बड़ी बेटी उनके असली वारिस बनना चाहते हैं। 

फिर राजनीतिक जीवन में नेताओं पर कई आर्थिक और आपराधिक मुकदमे लग जाते हैं। इनमें से कुछ असली होते हैं, तो कुछ नकली। यदि पार्टी का मालिक कोई और बन जाए, तो मुकदमों का खर्चा कहां से आएगा ? जेल हो गयी, तो उनकी रिहाई के लिए धरने-प्रदर्शन कौन करेगा ? इसलिए जैसे भी हो; पर पार्टी का अपनी घरेलू जायदाद बने रहना जरूरी है। सुना है मायावती के पास पार्टी के नाम पर अरबों रु. की चल-अचल सम्पत्ति है। कई मुकदमे भी चल रहे हैं। शरीर भी ढलान पर है। वोटर चाहे कहीं भी जाए; पर पैसा तो अपने पास ही रहना चाहिए। उनके संतान नहीं हैं; पर भाई और भतीजे तो हैं। इसलिए उन्हें ही नंबर दो और तीन के पद दे दिए हैं।