September 28, 2021

नैतिक जीवन के आधार हैं धर्म-संस्कृति

धृधातु और ‘मन्’ प्रत्यय के योग से बना धर्म संस्कृत के उन गिने-चुने शब्दों में से एक है, जिनका प्रयोग तो कई अर्थों में होता है, किंतु विश्व की किसी भाषा में उनका कोई वैकल्पिक शब्द उपलब्ध नहीं है। प्राय: अंग्रेजी के ‘Religion’ शब्द को ‘धर्म’ के अर्थ में प्रयोग कर दिया जाता है, किंतु वास्तव में न ‘धर्म’ ‘Religion’ है और न ‘Religion’ ’धर्म’। ‘Religion’ के लिए उपयुक्त शब्द है संप्रदाय। ‘धर्म’ को अंग्रेजी तथा विश्व की अन्य भाषाओं में ‘धर्म’ ही कहते हैं।

वस्तुत: धर्म का संबंध जीव के गुण एवं स्वभाव से है और यह उसकी मौलिकता से संबद्ध है (जैसे अग्नि का धर्म है दाहकता), जबकि ‘Religion’ ग्रहण किया जाता है, जिसे परिवर्तित भी किया जा सकता है। इस दृष्टि से व्यक्ति ‘Religion’ के बिना तो रह सकता है, पर धर्म के बिना नहीं।

शब्दकोशों के अनुसार ‘धर्म’ शब्द के कई अर्थ हैं, जैसे – कर्तव्य, न्याय, सदाचरण, सद्गुण आदि। धर्म का शाब्दिक अर्थ होता है, ‘धारण करने योग्य’  सबसे उचित धारणा  अर्थात जिसे सबको धारण करना चाहिए।

हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई, जैन या बौद्ध आदि धर्म न होकर संप्रदाय या समुदाय मात्र हैं। ‘संप्रदाय’ एक परंपरा के मानने वालों का समूह है। ‘Religion’ अथवा संप्रदाय के तीन पक्ष माने गए हैं – 1. कर्मकांड, 2. नैतिक आचार और परमात्म तत्व अथवा दर्शन का निरूपण। इनमें से धर्म केवल नैतिक आचार से संबद्ध है। धर्म का तथाकथित परमात्मा या भगवान से सिद्धांत रूप में कोई संबंध नहीं है। यह बात कुछ विचित्र लग सकती है, किंतु है सत्य कि धर्मशास्त्रों में धर्म की जितनी परिभाषाएं दी गई हैं, जितने भी लक्षण गिनाए गए हैं उनमें परमात्मा या भगवान का प्राय: नामोल्लेख भी नहीं मिलता। धर्म तो मानव को ही परमात्मा बनानेवाला रसायन है।

इसी प्रकार ‘संस्कृति’ शब्द संस्कृत की ‘कृ’ धातु में ‘सम्’ उपसर्ग और ‘क्तिन्’ प्रत्यय के योग से बना है, जिसका अर्थ है सुंदर बनानेवाली सम्यक् कृति। शब्दकोशों के अनुसार, यह संस्कार/परिमार्जित/शुद्ध करने की क्रिया या भाव है। अन्य शब्दों में ‘प्रकृति का उन्नत रूप ‘संस्कृति’ है और विकृत रूप ‘विकृति’ है, उदाहरणर्थ – वृक्ष से प्राप्त फल ‘प्रकृति’ है, उसकी संस्कार कर निखारी हुई अवस्था ‘संस्कृति’ और सड़ा हुआ या विकृत किया हुआ ‘विकृति’ है।

‘संस्कृति’ को एक दृष्टिकोण भी कहा जा सकता है।

इस प्रकार संस्कृति और धर्म दोनों में जीवन का मूलाधार संस्कार है। संभवत: इसीलिए सदियों से मानव-जीवन में सदियों से संस्कारों की व्यवस्था रही है। ये संस्कार जन्म से पूर्व भी होते हैं पश्चात भी। यह बात अलग है कि आज आधुनिकता की होड़ में लोग संस्कारों से विमुख होते जा रहे हैं।